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Wednesday, April 25, 2012

न जाने क्यों


बहती हवाओं में घुल सा रहा है मेरा मन 
पेड़ों को हिलाती, सरसराती 
ख़ुशी से भर देती हैं मन को ये हवाएं 
फिर भी घुल रहा है मन 
                             न जाने क्यों 
ठंडी सांझ की निविड़ शान्ति में 
फैली है शीतलता 
फिर भी पिघल रहा है मन 
                             न जाने क्यों 
वर्षाजल के शीतल प्रवाह में 
भीगे हैं सिर्फ पैर 
फिर भी गल रहा है मन 
                              न जाने क्यों 
मैं हूँ स्वतन्त्र , राह स्वच्छ है और समक्ष है लक्ष्य 
कोई नहीं रोकने वाला 
फिर भी टहल रहा है मन 
                               न जाने क्यों 
चारों और हैं विश्वस्त लोग 
निश्चिन्त है मष्तिष्क मेरा 
फिर भी दहल रहा है मन 
                                न जाने क्यों 
समक्ष मेरे भीषण जल वर्षण
कुछ भी नहीं है शुष्क 
फिर भी जल रहा है मन 
                                 न जाने क्यों 
न जाने क्यों है मुझे महसूस होता 
मन में कहीं कोई दरिया हिलोरें लेता 
पर लौट जाता छूकर तटबंध 
न होने देता अंतर्मन को मुखर , विचित्र है इसका द्वंद्व 
एक सोता सा है अन्दर ख्यालों का 
घुटता अन्धकार में 
सिसकियाँ सुने देती हैं निविड़ निर्जन में भी 
पर दिखाई नहीं देता कोई 
                                  न जाने क्यों 

Tuesday, March 20, 2012

हिंदी हाइकू 2

बिना शक्ल के
चेतावनी दे रहे
विचित्र प्राणी

translation:
strange creatures
without a face
are warning me.

Friday, March 16, 2012

निर्बल (when i was 15)

निर्बल 
संसार में क्यों होता है
तिरस्कृत ?
क्यों बनता भागी अपमान का ? 
सदैव प्रतिष्ठा उसकी 
अपहृत होती ....
निर्दयी संसारिकता 
क्यों है प्रतिबद्ध ?
खदेड़ने को उन्हें 
क्यों है लाचार 
संपत्ति के समक्ष झुकने को ?
क्या द्रव्य महान है मानव से ?
क्या अनुपस्थित भगवान् है ?
पुकार रहे निर्बल प्रतिपल 
होता क्यों नहीं त्राण है ?
क्यों नहीं है भयातुर 
शक्तिशाली  ?
दुरुपयोग शक्ति का 
इतनी स्वछंदता 
इतना उन्माद 
क्या ओढा है पशु ने 
मानव का आवरण 

और हम 
मूक बधिर बने देख रहे है 
मानवता के परिदृश्य को 
मूर्तिवत , जड़ 

पर चैतन्यता अंतिम सत्य है 
मानवता का 
उठो ,जागो 
पाप का घड़ा अब भार गया है 
करो चूर चूर ,
करो अत्याचार का प्रतिरोध 
सफलता तैयार है 
चूमने को कदम 
जग आबद्ध है 
सफल के समक्ष नत होने को 
घृणा उपस्थित होगी तब भी 
पर तब घृणा और इसके कर्ताधर्ता 
हो जायेंगे 
निर्बल 

Sunday, March 4, 2012

बेसुध दोपहर

हॉस्टल के उद्यान की छत में 
बड़े नीला चौकौर छेद से 
धूप झांक रही है 
जिज्ञासा भरी आँखों से 
नहाई धोई साफ़ सुथरी सी
पर फिर भी अलसाई और उलझी बिखरी सी है |
जरा सी गुस्सा है 
सूरज ने कोहरे की रजाई जो छीन ली उससे 
गुस्से और प्यार के बीच फसी चपतें लगा रही है हवा को 
उसके चारों और लिपटे हुए ही 
अधखुली आँखों से लटक रही है नज़र 
टूटे हुए क्षितिज की ओर......
रात से हुई कश्मकश से थकी 
लुढ़क रही है 
पेड़ों से उतरी , बेफिक्री से ठंडी हवा के साथ नाचती 
पीली खूबसूरत पत्तियों के ऊपर |
नीले गालों के नीचे कहीं अबूझी ललाई दबी कुचली सी है ,
नीम और बरगद के सहारे बैठी 
धीरे धीरे चबा रही है सूरज की किरणें और इमारतों की छाया 
कच्ची जमीन के छोटे छोटे गड्ढों में भरे पानी के साथ |
निश्चिन्त है और बेखबर है 
आंधी आ सकती है , झंझोड़ने मृत्यु तक 
और वर्षा हो सकती है , भिगोकर गलाने |
पर बिना छाते और चश्मे के भटक रही है इतस्ततः
कि कहीं मिल जाए जरा सा अँधेरा 
और खो जाये वो उसके आगोश में .....

Monday, February 13, 2012

हिंदी हाइकू 1

थूक रहा है
अनजान दिशा में
ज्वालामुखी मुझे


translation:
this volcano
is spitting me 
in direction unknown.

Friday, February 3, 2012

आईना (when i was 12)

दिखा रहा हूँ आईना , देख ले इंसान 
गुण अपने पहचान ,है हैवान या भगवान् ।
अवश्यमेव ही ये आईना  कुदरत की कृति है महान
सम्मुख व्यक्ति को निस्संकोच , सत्य का कराता ज्ञान ।
है एक मात्र यह शेष जग में , कराता सत्य का बोध 
क्यों इसे समाप्त करना चाहता मानव , लेगा क्यों इससे प्रतिशोध !
अस्तित्व सदा रहेगा इसका , आईना दुनिया से नहीं मिटेगा 
सत्य कहने की स्वतंत्रता इसको , यह गुलामी किसी की नहीं करेगा ।
पर सत्य से विचलित मानव , करता दर्पण पर कुठाराघात 
इस शाश्वत सत्य को करता क्यों नहीं आत्मसात ?
सत्य छुपाने की कोशिश की मानव ने , सत्य कभी छुपता भला 
सदा उजागर होकर रहता , इसकी अग्नि में इंसान जला ।

Friday, January 27, 2012

मुझे अभी तक कुछ समझ नहीं आया है


देखता हूँ जब
आवरणों के इस विशाल अम्बार को
तो विशवास नहीं होता कि
इस दैत्याकार पुलिंदे को
ढो रहा है कोई मानवी शरीर
इतनी मोटी और इतनी सारी
रस्सियों में जकड़ी है एक मानवी आत्मा
फिर भी ढूंढ रहा हूँ
छील रहा हूँ इस प्याज को
छीलते छीलते आ गए हैं
आँखों में आंसू
अब कमजोर पड़ रही है आशा
कि इन अनंत छिलकों के भीतर
होगा कोई फल

पर झूठी ही तो है मेरी धारणा
ये छिलके ही तो थे प्याज
और उसका फल
यों ही खोद डालना चाहता हूँ मैं
नर की मानसिकता को
चीर देना चाहता हूँ आवरण सारे
पर यों इन आवरणों के अम्बार के नीचे
ढूंढें नहीं मिलती कोई आत्मा
संभव है आवरण ही है आत्मा

पर आवरण तो मर्त्य हैं !


मेरे सामने बिखरे पड़े हैं
प्याज के छिलके
मेरी आँखों से अविरल निकल रहा है पानी
और मुझे
अभी तक कुछ समझ नहीं आया है |